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मैं तुम्हें याद आना चाहता हूँ, ताशकंद

 मैं तुम्हें याद आना चाहता हूँ, वैसे नहीं जैसे चातक को बादल या के तितली को फूल  मुझे तो याद आना है दरिया की तरह।  तुम सागर हो जिसने मुझे अपनी गोद में रखा करने दी अठखेलियाँ और मेरी चंचल अपरिवक्ता को भी संयम से स्थान मिला।  इतने विशाल हो तब भी  इतने स्थितिप्रज्ञ और दृढ़  बहने-गिरने वाली नदी कहाँ सीख पाती है।  सागर में कुछ तो है ऐसा, इसकी क्षितिज-विहीन सीमाओं के परे  कितना लोहा-लंगड़-संताप-ठूँठ बह आता है  और फिर भी माथे पर त्योड़ी नहीं पड़ती एक शहर- एक देश दोस्त और जानकर समंदर हैं अब सागर हैं जिसमें मैं बह कर गिरा  गिरा बार-बार और रंगरेज सागर ने  मुझे अपनी लहरों पर बैठाकर फिर से घाट उतार दिया हर बार एक नई सीप देकर- हर बार एक नया रंग देकर।  ये बंधन शब्दों से तो परे का है  कहा तो जा सकता है फिर भी… बस यही कहना था-  प्रिय उज़्बेकिस्तान  स्नेह- प्यार- मुहब्बत  इसी का पर्याय बने रहना।  नदी की नियति सागर में विलीन होना ही है-  होती रहेगी।

किसी को दिखता नहीं, इसका मतलब ये तो नहीं कि मैं हूँ ही नहीं!

मैं बहुत महीन हो गया हूँ ज़रा सी हवा, ज़ोर-झटक डिगा देती है मुझे अपने स्थान से सरूप नहीं है पता पर चोकोर और वृत के बीच वाला कुछ आकार है शायद। महीन मैं साहिब की ओर बढ़ने को तत्पर उमंग-उल्लास-अचरज-अचम्भा कुछ भी नहीं चेहरे पर, परन्तु विश्वास, विनम्रता, विनय, विनती  मांगने चला, मुर्शिदों की तलाश में मैं। लचक खिलोने की तरह जितना नीचे लुढ़का उतना की ऊपर उछल आता, हिम्मत करके, ये तो रमज़ भी किसी अजूबे निराकार की लगती मुझे। वो धो देगा मटमैला आवरण और करेगा शामिल अपने में, अपनों में, और फिर से छोड़ देगा इसी धरती पर , किसी दरिया में लुढ़कने को तलहटी से लगकर, लहरों में सिमटकर बहने के लिए। जब तलक नहीं मिले ऐसा कोई तो बस उड़ता रहूँ यूँ ही हवाओं में  अपनी ज़मीन देखते हुए- तलाशते हुए! किसी को दिखता नहीं, इसका मतलब ये तो नहीं कि मैं हूँ ही नहीं!

Taar nukiley hotey hain

 T aar nukiley hotey hain ghar k baahar diwaar k upar kinaare-kinaare kitne din bandhey rahtey hain na kuchh kahte na bolaa kartey hain Rukney waale ruktey khud hi ye na kisi ko roka karte hain aur to sab theek hi hai inka bas taar nukiley hotey hain

वो लौट आएं अगर

  वो लौट आएं अगर तो समय और सामयिक सिद्धान्त जीवन और समझ के, सब बदल जाएंगे यकायक। वो लौट आएं अगर तो मुझे सही संबल मिलेगा सबल होने का जो उनके साथ होकर मिलता था मिलता है अब याद करके-बात कर कर। कल की रात बादलों में अठखेलियाँ करता दो कला छोटा चाँद देखा था कभी बादल उसके ऊपर लुढ़कते तो कभी वो खिसक आता घटाओं में से जैसे मेरा बेटा कहता कि वो खेलता है पार्क में लगी फिसल पट्टी पर। ये चाँद होगा पूरा और मैं कर रहा हूँगा याद अपने गुरुओं के आशीष को और उनको भी जिन्होंने मुझे बोने दिए मेरे सपने उनके सच्चे मन की धरा पर। तपाक से बोल आता हूँ मैं पूरे दशक की कहानी कैसे किया इतना कुछ स्थापित एक नवाचार जैसा। मेरे सिखाने-मुझसे सीखने वाले एकदम जादूगर हैं! कुछ भी करवा लेते हैं। यकायक याद भी आ जाते हैं! वो लौट आएं अगर तो कितना अच्छा हो!

मुझे मेरी कविताएं कहनी हैं

मुझे मेरी कविताएं कहनी हैं और तुम्हें कहना है वो जो दोहराव से परे आभास के इस ओर की बात है। मुझे कहना है कि जब भी तुम कहते हो शब्द् सटीक-सुन्दर मैं उकेर देता हूँ पंछियों का कलरव बारिश की रिम-झिम खिलखिलाहट छुटपन की और रूमानी मुहब्बत की बातें... नाम तो मेरा होता है... सोचा है मैंने कि क्यों न ऐसा करें हम दोनों एक-नाम भी हो जाएं। एक तो हैं ही...!

साथी यूँ ही बढ़ते रहना...

  साथी! तुझपे सातवाँ पत्ता आया है सात जो बिल्कुल साथ-सा बुल जाता है... उच्चारण में... सप्त जो दिनों को स्वरों को रिश्तों के वचनों को... रंगों को... पड़ावों को गिनता है... क्रमबद्ध करता है... वही सात अगर मुझे भी मनबद्ध जीवनबद्ध साहसबद्ध नियमबद्ध कर दे तो कितना सरल हो जाये जीवन! साथी यूँ ही बढ़ते रहना... किसी भी रूप में किसी भी नाम से। बस हरे रहना! साथी... सातवाँ पत्ता मुबारक!

सुन मेरे हिन्दोस्तान

 सुन मेरे हिन्दोस्तान  तुम अगर इंसान होते ना  ज़ोर का गले लगाता  रो भी पड़ता और चुप भी रहता! कहता तुझसे कि इतना भी आसान नहीं हैं  अपनी ही मिटटी से दूर रहना और  भारतीय ही कहना खुद को! अपने तिरंगे को निहारना विदेशी आसमान में  और  कभी-कभी ये भी होना की उदास रहना  और कभी इतनी ख़ुशी कि सब भूल जाएँ! कभी अपने खाने को खोजना  जैसे जंगल में हिरन कोई कस्तूरी की खोज के हो  हिंदुस्तान मेरे, तुम अगर इंसान होते ना  लौटते ही तुम्हारी धरती पर,  तुम्हारे पैर छूता और कहता -  तुम कितने विशाल को, कितने ख़ालिस, कितने सच्चे  जैसे हो समावेशी तो हो ही,  मुझे समा के रखते हो खुद में और  शरीर भेज देते हो सीमाओं के पार -  देश तो अपना है न, अपने से है

सड़क से सड़क

आलू गन्ने सरसों गेहूं ! सूरज की सुनहरी किरणों से चमकते-इठलाते... खेत देख रहा मैं सड़क से सड़क जाते। कितना कुछ है समझने-देखने को! जीवन को संसाधनों को ये प्रकृति कैसे अनुमति देती ...

सड़क खोखली है नीचे से

सुखी नदी के ऊपर भला ये कैसा पुल है, यूँ लगता है के सड़क खोखली है नीचे से... घर की पूजा से नाकारा हुए फूल-पत्ते-छिलके धूं-धूं कर जली राख-कुछ कागज़-कोई टूटी मूर्ति पुरानी तस्वीर-लाल चु...

सपने तो रहेंगे ना...

मैं चाहे मिट्टी का बना हूँ... तुम भी। सपने मिट्टी के नहीं... ना बने हैं पानी के.. हवा के... सपने तुम से बने हैं। जब तक मैं हूँ... सपने तो रहेंगे ना....!

कुकुरमुतों के काफ़िले

सभी सभासदों के बीच ये बात है आज फिर कीडे-मकोड़े आने हैं। कभी हरियाली हुई काली और अब गुलाबी को बेरंग करते कुकुरमुतों के काफ़िले बढ़ रहे हैं। उन्हें बताया गया है के वे बढ़ रहे हैं ...

बस आ जाना

कैसा उलटफेर है जीवन का द्रोण बना रहे हैं मिट्टी से एकलव्य आँखों के पानी से भिगो रहे मिट्टी बरसते कभी-कभी थामते कभी तहों से अपनी थोड़ी मिट्टी उतारते उकेरते एकलव्य की शक्ल-भाव बरबस ही ज़्यादा भी उड़ेल देते हैं पानी और मिट्टी छप-छप हो जाती है। फिर कुछ देर थामते घटाओं को और चाक घुमाते जीवन का। द्रोण! टूटे-फूटे, रूखे-सूखे पड़े हैं यहीं, मेरे पड़ोस में, घर में, बगल में मुझ में! अब शांत रहते हैं उनके हाथ पानी भी और गहरे उतर गया है। एकलव्य की मिट्टी रम-सम सी गयी है उनके ही इर्द-गिर्द। अपने दोषों का रोपण कर बैठे हैं द्रोण अपने ही जीवन में। कड़ी फ़सल काटनी पड़ रही है बिलख कर रोते हैं रटते हैं दोहराते हैं कराहते हैं द्रोण। कहते हैं मुझे मुझे ले चलो कहीं उस छोर-उस ग्रह जहां आँखों में धुआँ हथेलियों में नमी ... ... पता नहीं द्रोण को क्या चाहिये बस पिछले पहर से ही बिलख रहे हैं। आओ तो एक रुमाल ले आना। कुछ और नहीं। बस आ जाना। याद जो आती है बड़े-बड़े ठूंठ हिला देती है।

संकोच कहाँ करता है

मनुष्य-कहने में कितना सजग सा शब्द है जीता है और जीतता है हारता है भी- भागता भी है। एक तरफ़ हो जाता है जब नहीं अच्छा लगता दूसरी तरफ़। और जब असमंजस हो इधर-उधर तो अपने आप को लेकर साथ स्थापना होती है आत्म-सम्मान की। जीवन चलाना है-चलना भी है। क्यूँ भला आसक्त हों-क्यूँ कभी परि-भक्त हों। अपनत्व अपने से ही हो तो कितना अच्छा लगता है। स्वयं को आये समझ जो वही स्थापित सत्य है।और जो है असत्य वह तो हवा में उगता है। क्यूँ हों आसक्त... किसी दुविधा नहीं- अपितु सुविधा का नाम है जीवन। तभी तो लगता है के दुपहिया है जीवन और त्रिकोण भी।

अभी तो राम रास्ते में हैं!

अभी तो राम रास्ते में हैं! आयें तो कहना... मैं आया था पूछने-बताने तो नहीं कहने-चेताने तो नहीं नहीं रोकने को- ना टोकने को... मैं आया था बांटने को बातें नाते-रिश्ते-सौगातें... मुझे बत...

राम

राम भला तुम हुए भी थे कभी और अगर हुए तुम तो किसके लिए थे बुराई पर अच्छाई की जीत या फिर मर्यादा के लिए। तुम थे मित्रता सिद्धान्त के लिए या के भगतवत्सल भाव या फिर तुम थे एक सभ्य-आदर्श पुत्र-पिता तुम भले भ्राता भी कहलाते हो और एक जीवनसाथी भी। अब वही उलझन है जग को जो जानकी को परखने में थी तुम्हें झगड़ा था कुछ-कुछ ज़िद्द-कुछ समझ-नासमझ। तब न्यायालय नहीं बैठे थे बस स्वतः ही पटाक्षेप हो गया था। तुम ही रह जाते तो कहीं भी रह लेते! अब तुम्हारे रहने को लेकर बहस है होने को लेकर असमंजस है। ना ही करते यात्रा जनमानस के मानस में तुम तो ठीक रहता। चारदीवारी में प्रतिबंधित होने के दंश से तो बच जाते। सोचता हूँ राम! अगर तुम नही आते (कल के बाद घर जायेंगे अपने राम। रावणों की दुनिया में हैं, कुछ बातें यहीं कह ली जाएं।)

आजकल

सचमुच आसान नहीं होता बंद दरवाज़ों से आती एक महीन सी रोशनी की लकीर के सहारे रास्ता सोचना। और मान लेना कि यहीं से कहीं जाता है इक और रास्ता जो इस दरवाज़े के उस ओर किसी नई दुनिया में खुलता है। शब्द् तो जो कहे जा चुके-कहे ही जा चुके हैं। पर इतना भी क्या भरोसा कहे शब्दों पर कि इंसान अपना कहा नकार न सके। दूसरे का कहा सुधार न सके। अनकही समझ न सके। कही को सही से मान ले। छोटे-बड़े होने से कुछ नहीं होता मगर छोटा-बड़ा बोलने से तो बहुत कुछ होता है भाई। कितनी बातें, बायें - दायें हो जाती हैं। मेले में-रेले में कितनी बातें इधर से उधर हो जाती हैं। पर जब ये बिछड़ी-उलझी बातें बुरा नहीं मानती- तो हम क्यों बुरा मान जाते हैं। छोटे को बड़ा कहलवाने से कुछ नहीं होता बड़े को बड़ा मानने से बड़प्पन आता है। ख़ुशी आती है। रिश्ते चल निकलते हैं। अच्छे से। #रामायणtales #दुनियादारी #आजकल

मितर प्यारे नूँ, हाल मुरिदाँ दा कहणा

इतना भी आसान नहीं नींद सो जाना चैन की। जो जानते हैं सुकून का रास्ता चलते रहते उसपर और जो नहीं जानते भटकते रहते ता-उम्र! जो दिख रहा हर ओर कि इंसान एक-दूसरे को ही काट रहा-छोड़ रहा औ...

किसे नहीं भाएगा भला...

किसे नहीं भाएगा भला... अपनी महीन रेशमी मुठ्ठी में जब जकड़ ले मेरी एक अंगुली को... और टिम-टिम करती आँखों से निहारे वो अपने पैरों को हवा में उड़ा मस्त दिखे और बुलबुले उड़ाये होठों से... बिल्कुल वैसे जैसे आपको भाते हैं। जब कुरेदे अपने रेशम से भी नरम नाखूनों से मेरे चेहरे को गोदी में आ चुप हो जाए रोने से और अहसास दे आपको सबसे बड़ी जीत का। निन्नु ले दैवीय सी अपने जीवन की पहली आपके सीने से सटकर... आप अपनी बाहँ डाले रखो के कहीं लुड़के ना इधर-उधर। जब बैठे-बैठे थकन की नींद भरपूर आनंद दे... सोये आपका बेटा आपकी गोदी में और नसीहत मिले के बिगाड़ो मत। और आप कहो के इत्ते से क्या होता है... और लगो इतराने-बतियाने-बोलने-समझने। इस से बड़ा क्या भला पागलपन के जब पता हो के इसे नहीं पता भाषा का और फिर भी सब कहे जाता हूँ-इसी यकीन से कि मेरा ही तो अंश है-इसी को तो सब पता है मेरा। कितना भला लगता है नोजी से नोजी भिड़ाना... और नटखटी बातें बनाना... और मासूम छुअन जादू कर दे मन पर तो बलैयाँ ले लेना चाँद की अपने। कभी ठुड्डी ढूंडो तो कभी नाक मिलाओ कभी ऒऒऒऒ कभी उ उ उ उ उ एक नयी वर्णमाला जिसका कोई सिमित व्याकरण नहीं।...

माँ किसान की बेटी है!

माँ तुम ठीक ही करती थीं हम रहते थे छोटे से एक कस्बे में और गर्मी की छुट्टियों में नाना के घर जाते थे। गेहूँ कटती थी उस मौसम में जब स्कूल की होती थी छुट्टी और ख़ूब काम करते थे हम खेतों में। मैं सो जाता था निढाल थककर सुनहरे मोतियों के ढेर पर मखमल से भी मीठी नींद आती थी। वो अनाज जो गेहूँ की बालियों से चुन लेते थे सब मामा मेरे कल भी-आज भी देखा जाते हुए-आते हुए दफ़्तर, वो तिजोरियाँ भीग रहीं हैं पानी बरस रहा है लबालब अनाज पर और तेज़ बारिश सावन नहीं लग रही मौसम सुहावना-रूमानी कुछ भी नहीं लग रहा ये बुरा-सा और याद आ रहा वो वहम माँ का हम रहते थे छोटे से एक कस्बे में, माँ दौड़ कर रख देती औंधे मुहँ काला तवा, बरसना रुक जाएगा-गेहूँ नहीं बहेगी-किसान बच जाएगा-अनाज बन जायेगा! माँ का ये सत्याग्रह कितना ज़रूरी है, माँ किसान की बेटी है!

पूरा चाँद कितने उफान लाता है

पूरा चाँद कितने उफान लाता है भावों के अभावों के आने और जाने के सुनने-सुनाने के भूलने के-भुलाने के रूठने के-मनाने के रुकने-लौट के आने के। पूरे चाँद को इतना कुछ पता कैसे होता ह...

गुरु मेरे! तुझसे हूँ मैं बड़भागी!

मेरे भाग्य में कहाँ लिखा था साहस विद्या सफ़लता और समर्पण! पग-पग पर पहरा रख कर पल-पल मुझे पाल कर अपने संग मुझे संभाल कर चाक बन घूमे हो आप। आज भी वही गति-गंतव्य है मुझ जैसे कितने कच्चे ढेर सवांर दिए अपने अस्तित्व से जोड़ कर। समय ने टकोर दी भी तो आप ये सुनिश्चित करते रहे... मुझ तक पहुँचे बस वही जो बढ़ाये-बनाये मुझे। आप गुरु जो बने रहे मेरे भाग्य की लकीरों में अर्थ तभी तो आया, आप गुरु जो बने रहे मेरे मन में साहस तभी तो आया, आप गुरु जो बने रहे मुझे संभलना-संभालना आया, आप जो रहे हैं जीवन में मैंने स्वयं को बड़भागी पाया, आप... गुरु बने गुरुवर तो ही तो मैं शिष्य कहलाया! मुझमें साहस-विद्या-समर्पण आपसे ही तो आया। .

हम दोनों एक-नाम भी हो जाएं...

मुझे मेरी कविताएं कहनी हैं और तुम्हें कहना है वो जो दोहराव से परे आभास के इस ओर की बात है। मुझे कहना है कि जब भी तुम कहते हो शब्द् सटीक-सुन्दर मैं उकेर देता हूँ पंछियों का कलरव बारिश की रिम-झिम खिलखिलाहट छुटपन की और रूमानी मुहब्बत की बातें... नाम तो मेरा होता है... सोचा है मैंने कि क्यों न ऐसा करें हम दोनों एक-नाम भी हो जाएं। एक तो हैं ही...!

तुम उठोगे जब कल सुबह...

तुम उठोगे जब कल सुबह सब वैसा ही होगा क्या? वैसा के जैसा तुमने देखा इस भद्दे सपने में तुमने देखा किस तरह से अपना घर लूटता है कोई ठहाके लगाकर। तुम जब सुबह उठो कल तो अपने छोटे-छोटे बच्चों से कुछ बात ना करना। बिल्कुल चुप रहना-बाहर जाना घूम आना। वो जिस दिन तक अपने स्कूल ना जाए एक बार खेलने ना जाए पास के पार्क में एक नज़र कुछ खरीदने न जाए... तब तक मत करना बात कुछ आज रात तक की। वो आएगा जब वापस देखता हुआ शहर को-क़स्बे को तो... पूछेगा तुमसे! पापा... कौन आया था हमारे यहां... किसको इतना गुस्सा आया... वो मेरा दोस्त नहीं आया आज स्कूल। पापा... मम्मा... मैंने आज बहुत सारे फौजी देखे हमारे शहर में सब जगह। ये उन्हीं हेलीकॉप्टर में आये होंगे ना? वो हेलिकॉप्टर क्यूँ आये थे पापा? पापा... आप कहाँ गये हुए थे... माँ.. चाचा..अंकल... ताऊ.. दादा... आप सब कहाँ गए हुए थे? ... मुझे बहुत बुरा सपना आया अभी... सब जल रहा था...

सारी उम्र चाक बन घूमता है... मिट्टी को थामे रखता है...

बूंद भर उम्मीद समेट कर ले जाता है कतरा कतरा टटोलता है आशा और तराशने की तलब बढ़ाता जाता है दिन-दिन रात-रात जगता है सवालों के साथ सोया हुआ मिलता हैं कई बार घिरा हुआ जवाबों की जमहाई में दीवारों के बीच एक हरियाली पतंग बन उड़ता है थामता है कांपते मन माँगता है साथ ज़्यादा-सबसे बात करता हुआ सीखता जाता है। कई-कई बार तराज़ू में तुलता है-हल्का हो जाता है बाँटकर सब अपना ज्ञान! अपनी किताबें साँझी करता है- अपने घर-परिवार का कर लेता है विस्तार कभी मैदान की तरफ भाग लेता है खेलने को नन्हों के साथ और कभी रूमानी हो जाता है भीग बारिश में! हर दोहरा मानी संभाल लेता है- गर्मियों के खाली दिनों में बड़ी उदासी से चुप रहता है- सावन बन आते हैं वापस सुनने वाले तो बरस पड़ता है-खूब बोलता है छुट्टियों के बाद। अपने गुरुओं को याद रखता है- वैसा-सा ही बनना चाहता है। एक कुम्हार का संसार जैसे चाक पे होता है तैयार... सारी उम्र चाक बन घूमता है... मिट्टी को थामे रखता है... जब तक रूप नहीं लेती सही! एक पढ़ाने वाले का जीवन कितना काव्यात्मक होता है... कुछ भी कहो... अच्छा ही होता है! ‪#‎Teacher

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घूर के देखता हैं चाँद

घूर के देखता हैं चाँद तलहट्टी में बैठा उदास सपने बीन रहा होता है जब और मैं आवाज़ लगा देता हूँ ख़राश भर आवाज़-टकटकी लगाकर लगा तो देता हूँ... पर चाँद रूठ जाता है- जा बैठता है आसमां पर और छेड़ देता है वही कला-राग फिर से घटने-बढ़ने लगता है और कभी बढ़ने-घटने ... नाम लेकर जगाता है छोटा है मुझसे पर मुझे महसूस नहीं होता... वो अपना है- उसे अपना मानकर-निभाकर ही तो बड़प्पन आता है। चंद दिनों का नहीं चाँद दिनों का रिश्ता है- भाई-भाई हैं मैं और चाँद!

पहली बार आज सुबह...

पहली बार आज सुबह... हर रोज़ की तरह दफ़्तरी भाग-दौड़ थी कुछ नया ना भी होता तो कुछ अचम्भा न था... पता-सा था कि जाना है दफ़्तर सड़क रास्ते-सड़क बनकर। रोज़ का आना जाना ऐसा है के जैसे मेरे और उस कंकरीट संसार के बीच मैं ही सड़क बन गया हूँ। खैर... आज की सुबह अलग हुई कैसे भला... देर तक खेला-की बातें मैंने उस से और उसने जवाब भी दिए सब सही और सटीक जवाब। स्वर आते हैं सारे उसे। और मुझे वो संगीत लगता है। गोद में लिया सीधे हाथ तरफ और काँधे लगाया वाम हस्त थपकी दोनों जोड़ी आँखों का मिलना मद्धम मद्धम सी नींद झुकती पलकों में प्यार और फिर उसने अपना मुझ-सा चेहरा रखा मेरे काँधे नन्ही हथेली से थामा मुझे और पहली-सी बार मुझे गले लगाया... सो गया-मीठी मीठी नीनि! ...और समझाया कि प्यार-अपनत्व-हमारा रिश्ता कितना दैवीय है। :एकलव्य के लिए!

शहर को ज़िंदा करें कैसे...

कोई अगर शहर ज़िंदा करने निकले तो कहाँ-कहाँ सांस फूंकने पड़ेंगे? जवाब नहीं मांग रहा मैं मुझे तो पता है कि पता है तुम्हें। मिलकर ही तो दम घोटा है शहर का। कभी क़स्बा रहा होगा उस से भी पहले गावँ और उस से भी पहले ज़मीन हुई होगी। ज़मीन जिसे पता नहीं था कि बंटेगी मात्र नहीं ढकी भी जायेगी और छिनी जायेगी। शहर ज़िंदा करने निकलो तो दरख़्त ज़िंदा करने पड़ेंगे पर कैसे करोगे दरख़्त कहाँ हैं अब हज़ारों कस्बों नें आकर शहर को ढक दिया है छुपा दिया है दरख़्तों को। कुछ जो नज़र आते भी हैं कृत्रिम-समर्पित संग्रहालय हैं बस। सड़क के किनारे चौराहों पे भी भला कभी पेड़ जीते हैं। जो हैं हरे-वो हैं डरे नहीं डरेंगे तो फेंक दिए जाएंगे। शहर में ज़मीन-पेड़ों के अलावा रिश्ते-इंसान भी मरा है। और इनकी चिकित्सा संभव नहीं। जिसको ठीक करना है वही तो गुनाहगार है। ख़ुद को सज़ा देगा नहीं। तो भला शहर को ज़िंदा करें कैसे...

बुरा नहीं होता फ़ेसबुक पर दर्ज़ होना सचमुच... बुरा नहीं होता।

बुरा नहीं हैं फेसबुक पर दर्ज़ होना पुराने-जीवंत जीवन को फिर से संजो लेना पुराने जिगरी दोस्तों को ढूंढ कर। बुरा नहीं है मन की बात कहना और सूचित रहना-जागरूक रहना। बिना पुछे मित्रों का कुशल-क्षेम जान लेना... बुरा नहीं है बधाई देना- बिना बोले स्वयं लिख देना दीवार पर भाव अपने और निश्चिंत हो जाना कि संबंध संभाल लिया है मैंने! बुरा नहीं हैं... छोटे शहर से आकर बड़े शहर में बस जाना। किराये के मकान को घर के वहम में रंग देना और अनमने मन से मन लगा लेना हर चीज़ में। दौड़-भाग-भागम-भाग में दौड़ते रहना और मशीन की भांति आराम-अवकाश के लिए कराहना। बुरा नहीं है बिलकुल भी आधुनिक होने का ढोंग करना और बाज़ारी सजावट में जाकर त्योहार ख़रीदना। बुरा तो नहीं हैं अपने गाँव को याद रखना या के बुरा है... दिये की भांति टिमटिमाना आस-पास अंधेरे के। भीड़ भरे जंगल में जहां सड़कें वहीं रहती हैं - बस शरीर दौड़ते हैं-अंधाधुंध सुबह को इसलिए कि शाम तक लौट कर आना है और शाम को इसलिए कि सुबह... एक गली भर मुल्क बनाकर एक मकान का एक तल... उसकी पर सब... ओ हुसना... ओ गुलाल... ओ जंगम-जोगी ओ री गऊ दहलीज़ तक आने वाली... बुरा नहीं होता है कमाना... ...

शब्द ज़रा मेहनत करने से ही सधते हैं।

शब्द ज़रा मेहनत करने से ही सधते हैं। (ये प्रेरणा पंक्ति Dinesh Dadhichi जी से) तभी तो हम करते हैं साधना शबदों से। सत्यम भी तो शब्द ही हैं होते और शिव की सुन्दरता भी शब्द। जब हमें शब्द नहीं मिलते तो कितना कुछ अधुरा रह जाता है। और शब्द निठ्ठले हो जाएं अगर तो बिगड़े हुए बेटे के निसहाय पिता सा अफ़सोस हो जाता है। जब श्रवण होते हैं शब्द तो हमारी आँखे बन हमें जीवन तीर्थ करवाते हैं। वाणी की शक्ति शब्द पर्याय बना देते हैं असहाय के भी। बरस कर भर देते हैं रिश्तों में मिठास और खाली बरसे तो देते ही हैं खटास। रास्ता बनाते हैं दीवारों से मिलवाते हैं सांझे सरोकारों से। और दिल से दिल तक कह जाते है मुहब्बत चुप वाले चुप ही रह जाते हैं। कितनी बार पिरोते हैं मोतियों की भांति कभी- कभी यूँ ही बिखेर देते हैं आँगन में- बच्चे के कंचों की तरह। पटक भी देते हैं और संजो भी लेते हैं अपने-अपनों के लिए। मुझ-से कितनों की रोटी आती है शब्दों से ही। कितना कुछ करते हैं देखो शब्द... तभी तो कहा... शब्द ज़रा मेहनत करने से ही सधते हैं।

My Favourite Reading: Jonathan Livingston Seagull

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...पर शब्दों परे की बात कही नहीं जाती।

शब्दों से परे की बात है जो मेरे लिए वो तू अपनी नर्म मुठ्ठी में दबाये बैठा है। मेरी हथेली में शब्द मेरे भाग्य के पिरोये जाता है तू। तू युग सौंपता है और ज़रा सा भी दंभ नहीं। अहि सही कहते के सत्य तो वही जिसका संकेत तुम करो ये बचपना अनजान नहीं सब जानता है। मानवीय नहीं बस दैविक सब। तुहारी पलकें-आँखें मध्धम-मध्धम बोलना बुलबुलों से और हमारा जीवन दिखा देना हमें। तेरी मुट्ठी का जादू देख मेरे सर चढ़ बोलता है। पर शब्दों परे की बात कही नहीं जाती।

ये पल तुम्हारा है।

ये पल तुम्हारा है। कान्हा ! झूमते-झूलते निहारते-किलकारते इठलाते-सकुचाते रोते-मुस्कुराते सब तुम्हारा है। माखन और दुलार सरल और श्रृंगार पूर्णता-और सार... ओ मेरे करतार... सब तुम्हारा है। गोद में अँगड़ाई अँखमीच जम्हाई कमर की तागड़ी गले के चाँद-फूल रात को जागना अपना समय माँगना बतियाना-जीवन सिखाना। अब तो सब तुम्हारा है। कान्हा! देखो तुम्हें बहाना बना कर हम अपने प्रेम की उपासना करते हैं। शब्दों से परे हो तुम। परिभाषा से परे कोष-संकोच से दूर। कहाँ कही जाती है बातें तुम्हारी।

For Eklavya- on EklavyaParv 07 August

शब्दों से परे कितना कुछ होता है अहसास होता है आभास रहता है और फिर एक दिन आपका बचपन आपकी गोद में आ आपको बाँध देता है। आप उसी की मुस्कराहट में मुस्कुराते हो। वही आपके सपनों को जीवंत करता है। शब्दों में नहीं कही जाती कुछ खुशियाँ हाँ बस बाँट ली जाती हैं। मैं जब छू रहा अपने आप को अपनी बाहों में और अचंभित हो रहा हूँ जीवन कितने अच्छे से पिरोया है उसने और नन्हे-नन्हे हाथों में समेट दिया है संसार मेरा। शब्दों से परे है पापा-मम्मा कहने वाले का आना। हाँ, ख़ुशियों मेरी-हमारी मैं कह रहा हूँ। स्वातिपर्व और हमारा एकलव्य आया है आज।

तुम मेरे आप हो... आप मेरे गुरु हो!

Respect and Love To All My Teachers.... From the Teachers of Guru Nanak Public School to Govt Senior Secondary School to K.T. Govt College Ratia... From UTD English to University College of Education... From Lather Sir's KUK and M.M. Polytechnic to My Students at Amity University... From my Parents to My Life Companion and Son... From Each One of YOU to Me... It is All Learning that has Happened to me! Parveen could not have been more better than this! I bow my head to my Teachers and Express my gratitude to them! If I can ever deliver a small portion of learning like them....as they did..have been doing..I shall feel fortunate! Being a Student, I can never surpass the Masters and that makes me feel more blessed! ....................................................................................................................... शब्दों को दोहराने की आज़ादी दे भी दो मुझे तुम तो तुम्हारे लाख कहने पर भी मैं कैसे लिखूं-कहूँ तुम्हारे बारे में कुछ! लाख पढ़ा-लिखा हूँ मैं मेरे मानस की र...

कथा भाव से मिले और भाव मिले कथा से।

कहो तो अगर बढाऊं आगे मैं दहलीज़ लफ्जों की कथा भाव से मिले और भाव मिले कथा से। और ये देखो ज़रा तुम्हारे हामी भरते ही किलकारियां लगी हैं खिलने और खुशबुएँ गूँजने लगी हैं मेरी-तुम्हारी-हमारी ओर। और ये आभास कितना अद्भूत है मिलन का। कभी सुनहरी-तो कभी सुर्ख़ कभी सुंदर तो कभी सुंदर से भी सुंदर। कितनी कल्पनाएँ कर लीं हैं हमने और सांझी ख़ुशी दे दी है हर आरोहण को-कथा को। सपने इतने सुंदर कभी ना थे अहसास-आभास तुममें मेरे होने का मेरे लिए जीवन से भी सुंदर है। : मद्धम मद्धम आँखें खुलना ख्व़ाब में भी तुम रहे और ख्व़ाब के बढ़ने बाद भी तुम ही सामने। तुमसे आती सर्द-गर्म साँसे और मुस्कुराहटें अनगिनत मुझसे मिलती हैं जैसे मैं कोई फूल अधखिला सा और तुम सुनहरी सुबह की रोशनी बनकर मुझे पूर्ण करते हो जीवन अपना मैंने तो न सोचा था ख़ुद ही कल्पना मैंने तो ना की थी अपने लिए पर जिसने भी मेरा ये जीवन बुना है कितना अच्छा है के मेरे लिए साथी तुम्हें चुना है।

देखें हम सारे ... सर्दियों की धूप

हल्की ख़ुश पहली सी प्यारी अनोखी मुझ सी तुम सी सब सी बचपन भरी एकदम खरी ज़मीन पे आती सबको भाती दूर बहुत ही दूर की रहने वाली मद्धम मद्धम कहने वाली हर मौसम में आये जो हर मौसम लजाये जो कभी पकाती कभी सुखाती कभी जलाती और कभी बुझाती दिन को ये ही लाये हम तक हाँ- सच में सब तक-हम तक दहलीज पे आती दिवार पे चढ़ती आंगन में खेले बन जाते रेले नहीं आती तो ठिठुरन भी होती आ जाती टीओ बैठक जमती गाँव-देहात से शहरों तक दिन-दिन और पहरों तक जुड़ी हुई है सबसे ये तो यहीं रही है कबसे ये तो आओ चलो मिलते हैं इस से साथ-साथ में बात-बात में देखें हम सारे आज... सर्दियों की धूप

एकलव्य पर्व EklavyaParv

एकलव्य पर्व ला रहा हूँ, कोने का केबिन अपने एक नए साथी को, जायदा ज़िम्मेदारी दे रहा है! एकलव्य जीवन का वह रंग है जिसे हम सब जी रहें हैं। सीखने वाले सब हैं-सिखाने वाले कम! या कहें, कि पसंद-नापसंद का मसला आ पड़ा है, और मुझे तो वही एकलव्य अरसे से याद आ रहा है, जिसने सीखा भी उसी गुरु से जिस से सीखना चाहा और गुरु का इंकार भी झेला! आइये, साथ चलते हैं eklavyaparv.com in a few days..

दीवार के उस पार-मेरे ही हैं सब!

दीवार के उस पार... दीवार के उस पार भी तो मेरा हिस्सा है मेरी यादें हैं! वहाँ भी वैसा ही उजाला है वैसे ही मौसम हैं... वही पतझड़ है वहाँ भी इतने ही पत्ते-जितने के यहाँ हैं गिरते उतने ही तो वहाँ भी गिरते हैं। वहाँ भी आग का धुआँ ऐसा ही तो है मेरे घर जैसा! इश्क़ भी वहाँ ऐसा ही और तो और बचपन के रंग भी... हुसना यहाँ गाये कोई तो वहाँ भी तो सुनता है कोई... कराहटें-और आहटें किस्मतों की सिलवटें ज़मीन के रंग-खाने के ढंग लिबासों की लज़्ज़त पकवानों के रंग... पानी का भी स्वभाव एक हवा-आसमां, और तो और गालियाँ भी सांझी। दोस्त को, दीवार के उस पार भी, वहाँ भी यार-बेल्ली-मित्तर प्यारा कहते हैं। वहाँ भी वही शाल ओढ़ते हैं सर्दी में जैसी मेरे यहाँ। वहाँ भी तो वही लोग हैं- जो दीवार के इस पार थे कभी। तीज-त्योहार-ख़ुशी-गुबार टीस- सब तो एक सा है। दीवार के उस तरफ़ भी-इस तरफ़ भी। कान लगाकर आवाज़ें नहीं सुनो तो भी आवाज़ आ ही जाती है। हम पड़ोसी नहीं हैं। हम भाई हैं। नक़्शे रिश्ते नहीं बदला करते। दीवार के इस-उस पार का अंधेरा-उजाला सांझा है। #unitedEmotions #IndiaPakistan @koneykacabin...

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...yet another year of being Parveen!

"The difference between the impossible and the possible lies in a person's determination." It has been not that long time-but still almost five years ( over five years may be as the packing had started) since I joined an unknown workplace. I was less aware of the stature of my job; more fascinated about shifting to a place, I actually did not craved as I felt I was too simple-small to reach here. The call on the landline, that my mother had picked (from Chhaya Chandraker ), I did not respond the call on Mobile-She still called on the landline to reach me-... The call on landline, when I had agreed to be a candidate for interview seems a thing of yesterday because of the trueness of it. I, then asked Kanwar Gagan Deep Chauhan and he said come-I am here and no problem about stay during the process at all... Another elder brother Vijendra Malik .. and we three made a brotherhood of staying together for more than a couple of years in the same flat.  Of Cour...

घर तो घर होता है... घर में माँ होती है

घर तो घर होता है घर में माँ होती है पापा होते हैं। घर में दिवार-छत के अलावा भी बहुत कुछ होता है घर में बाम होता है माँ से ही लगवाने को झूठा-मूठा जुकाम होता है। घर में धुप होती है छावं होती है चाव भी होता है। घर में ठहाके होते हैं घर में घड़ी की टिक-टिक भी है। आस-पड़ोस घर के आस-पास ही होता है, दीवारें सांझी बनती हैं मुंडेरें-गलियारे साथ-साथ सट जाते हैं। घर से ही तो काम पे जाया जाता है। घर ही तो लौट के आया जाता है। घर कब गरीब होता है भला सब कुछ कितना करीब होता है भला। अपनापन होता है जी घर में घर में फुसफुसाहट होती है एक को दुखता है तो सबको कराहट होती है। घर में बाज़ारी कुछ नहीं होता सब सुंदर होता है मन पे भारी कुछ नहीं होता घर में। घर में चप्पलें बंट जाती हैं चद्दर-कम्बल उलझ जाती हैं। घर में कितना कुछ छोटा-छोटा होता है। और घर कितना कितना बड़ा होता है।

शनि की बातें कच्ची । शनि की बातें सच्ची ।।

शनि कितने भेस बदल-बदल आता है ना मौसम देखता है और ना ही मौका ना तो जगह ना ही कभी देखता है वजह। कभी देखा कनस्तर में... आज भी वहीँ बस ताज़ा गेंदे के फूल की दो मालाएं घेरे हुए-सेवक तो कोई फिर भी पास नहीं। शनि कभी कनस्तर में कभी थाली और कभी डोलू में डूबा हुआ आ ही जाता है। और कैसा दिखता है भला बताओ तो जब तुम्हारी आँखों की तरफ खाली हथेली फैलती है मांगता है भीख एक ठिठुरता चेहरा झुर्रिओं भरा शरीर ढका-अधढका किस धर्म का कहूँ भला... रुखी हथेली-ठिठुरती आँखें पुकारती ज़रूरत भरी आवाज़ आने-जाने वाले को। और हर आने-जाने वाला मगन है जागरूकता के दंभ में। मौसम की ठंडी बदली हाथ जाने तो नहीं देती जेब में पड़े सूखे पैसों तक हाँ पर बात मन तक तो चली ही जाती है। शनि की बातें कच्ची । शनि की बातें सच्ची ।।

कह दे के, बोल दे अब तो

कह दे के, बोल दे अब तो- अब तो वक़्त तुम्हारा है। बरसों-बरसों की ख़ामोशी बीती- अब तो पास किनारा है। जिंदा होना-जिंदा दिखना; कहना-सुनना चलते रहना और भला क्या सोच रहे हो- इतना ही काम हमारा है। बुझे पड़े हैं चेहरे देखो-कहो ज़रा हुक्मरानों से अब तो, कौन-सी तुम आब हो पीते- हमारे घर का पानी खारा है। कुछ मुहब्बत की बात करें भला कैसे- क्यूँकर हम ....... ....

ये साल जिसमें तुम मिले...

आओ हाथ थाम कर देखते हुए सपन सांझे आगे चलते हैं। उस तरफ जिस तरफ़ से आती हैं खुशबुएँ मीठी और सब अपनी बातें सुनाई देती हैं जहां वहीँ जहां तुम रहते रहे- वहीँ जहां मैं मिल गया तुमसे वहीँ जहां सब रंग मिलकर एक रंग के हो जाते हैं। वहीँ जहां अनहद का विस्तार है कथा और भाव हैं। बीते साल ने इस साल को और इस कैलेंडर ने एक और नए कैलेंडर को दे दी है आवाज़। और देखना तुम... जैसे इस बारहखड़ी में तुम और मैं एक शब्द बने आने वाले दिनों में यही साथ बढ़ेगा। ये साल जिसमें तुम मिले पहचान मिली इस साल की बरकत बनी रहे कल और उसके साथ आने वाले हर कल में।

छोटी-छोटी अँखिओं में...

छोटी-छोटी अँखिओं में बड़े-बड़े सपने कैसे पल-पल पल जाते हैं ये अपने... नयी-नयी सी आहट आती और कहती वही पुरानी बातें अपनी सबकी और कहती हैं अपनी ज़ुबानी। कोई विराम नहीं है देखो और नहीं कोई श्योक्ति भी हाँ पर यादों में अनुस्वार है अनंत-अद्भूत पुनरुक्ति भी तो है। कैसा-किसने घड़ा है ये व्याकरण किसने बनाई है ये क्यारी कौन खेल रहा गुनगुनी छुप्पा-छुप्पी कुछ भी छुपा नहीं-गुम नहीं है यहाँ... छोटी-छोटी अँखिओं में बड़ी-बड़ी यादें... छोटी-छोटी यादों में देखो धुंधली-सी परछाई-सी है... चेहरा भी तुम्हारा मुस्कराहट भी और देखो नाम हम दोनों का... छोटी-छोटी अँखिओं में।

आभास...

आभास कितना सहज है होता जब आता है पिरोये हुए अहसास को अपने में। आओ सहजता का आभास पिरोयें अपने में।

कथा की कहानी

मैं कथा की कहानी कहने चला हूँ। कथा को हम सभी जानते हैं। हम सब में एक कथा है- मुझमें और आप में - हर उस मन में कथा का ठहराव है जिसे आस पास का कुछ महसूस होता है। कथा प्रतीक है- पर आप इसे एपिसोड्स में नहीं बाँध सकते। अभी तो आईडिया ही आया है- जब कुछ कहने लायक होगा तो छप जाएगा फेसबुक पर भी। अभी मन के काग़ज़ों पे ही छींटें पड़ रहे हैं। आओ कहानी कहें। विशेष नोट ( इंग्लिश में भी लिख सकता था मैं पर मित्रवर नकार गए सो मन की बात मन की भाषा में लिखी जाएगी)

अराजकता के महासम्मेलन

सभी सभासदों के बीच ये बात है आज फिर कीडे-मकोड़े आने हैं। कभी हरियाली हुई काली और अब गुलाबी को बेरंग करते कुकुरमुतों के काफ़िले बढ़ रहे हैं। उन्हें बताया गया है के वे बढ़ रहे हैं जब सभासद जीत रहें हैं। फिर भी नागरिक का सामूहिक शोषण है। उदासीनता है- हताशा है प्रजातंत्र में। भंग करने की लालसा है जनता में। कि अब नहीं उम्मीद कोई बस गिरावट ही गिरावट है। और देखो भला... असमंजस में फ़सीं भेड़ें गाड़ियों में ठूस ली गयी हैं। वही गाड़ियां पहले हरी पगड़ियों से सनी और अब गुलामी का गुलाबी पहन के सर पे बढ़ी जा रही हैं। आज तो ख़ाकी भी डंडा लिए जनता की सेवा में है। मजाल है कोई जाम लगे। आज-कल तो अराजकता के महासम्मेलन होते हैं। आओ शाम की वापसी की हुल्लड़बाज़ी का इंतज़ार करें।

हम निभा लें धरती ही...

जहां चाँदनी मुस्कुराती हो समय से आती हो-साथ रहती हो। ठंडक स्वभाव में होनी ही चाहिये। और क्या जवाब दें भला... ग्रहों-ग्रहों भटकने वाले हम निभा लें धरती ही तो बहुत होगा। मौकापरस्ती की कौम है बनी सारी थोड़ा इसी गिरावट को सम्भालें तो बहुत होगा।

क्यूँ भला- क्या भला

क्या भला करते हैं हम कोशिश प्रयास क्यूँ भला हम करते हैं। गाहे-बगाहे सफ़ल भी होते फिर भी तो संकोच हैं करते। दोहराते हैं हम वही विधि जिसमें आती है निति। इक नन्हे बालक की भांति जीवन को चलाते हैं और दंभ भरते हैं परिपक्वता का। क्यूँ भला करते हैं हम कोशिश प्रयास क्या भला हम करते हैं।

अनमनी सी इक मनी

अनमनी सी इक मनी किसने मानी किसने सुनी। हिस्सेदार कईं हैं इस मनी के और अहिस्सा रहा एक बस अनमनी कैसे बने सहमनी किसने बनायी है भला अनमनी कैसे बनी।

मन उज्ज्वल तो जग

मन उज्ज्वल तो जग जग उज्ज्वल तो हर ओर जग-मग जग-मग होती है। रस्ते-रस्ते खुशियाँ आती आती हैं लड़ियाँ खिलती खुलती हैं पेटियाँ-बक्से बंटते हैं खेल-खिलौने मीठा-शीठा भी तो आता बम्ब-पटाखे कोई लाता। कोई कोई क्या सब कोई ये और सारे त्यौहार मनाता। दिन किसी के आने का वापस अपने घर-अयोध्या में और दीप जले घर-घर देखो जग-जग मग-मग करते हैं। बात यही है समझ में आती घर लौट के आना अपनों के संग ही दिवाली है होती । आओ चलो मिलते हैं सबसे मेरे तेरे सबके अपने... अपने भी वही हैं होते सुख-दुःख के साथी हैं जो सब। आओ मिलो... दीप जलाओ-ख़ुशी मनाओ।

आज आख़िरी बार रतिया जाना है-औपचारिक रूप से तो... October 30,2013

मिगलानी टी स्टाल पे चलता लखबीर सिंह लख्खा का भजन... काम होगा वही जिसे चाहोगे राम...अपने स्वामी को सेवक क्या समझाएगा.. उंघते से कुछ मेरे जैसे लोग कुछ तरो-ताज़ा. यात्री.. सब आ-जा रहें हैं। सड़क के दूसरी ओर अख़बार असेम्बल हो रहे हैं। उनमें इश्तहार डल रहे हैं। और ये काम इतनी तेज़ गति से हो रहा है कि पारंगत हाथ-आँखें और दानवीर जिह्वा से आप प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकते। लखबीर -झुला झूले रे बजरंगी हनुमान..-पर आ चुके हैं। अखबार की कार्यशाला के पास ही सोया हुआ छोटा सा पुलिस थाना है और बगल में ही एक असहाय एटीएम। मुझे किसी ऐसी गाड़ी का इम्तजार है जो अखबार ढोती हुई मेरे शहर से होकर जायेगी। फतेहाबाद से रतिया आप हर वक़्त नहीं जा सकते बस से। बस के आने में अभी तो पैंतालिस मिनट हैं। रतिया के लिए-मेरे लिए फतेहाबाद शहर हुआ करता...फिर हिसार इससे बड़ा लगा..कुरुक्षेत्र से पढ़ाई की तो (एक अखबार वाली गाड़ी मिल गयी है-जिसमें पीछे के हिस्से में सीट हैं और ड्राईवर मिगलानी से चाय पीते ही चल पड़ेगा) ...कुरुक्षेत्र से मैं चलता फिरता संसाधन बना और कुछ दिन-महीनों फतेहाबाद मैं अपनी पहली नौकरी की। और फिर एमिटी ने बु...

नीम से कुछ पत्ते गिरे हैं...

नीम के पेड़ से आज अभी पत्ते गिर रहे हैं- सड़क भरी पड़ी है पत्तों से जो टूटे हैं अलग-अलग टहनियों से कोई तो मज़बूत रही होगी किऐ कमज़ोर ने भी त्याग दिया होगा फिर भी कोई टकराव नहीं सब सहज हैं-समर्पित। पत्ते ये किसी के भी पैरों तले आ रहे हैं। कितने सहनशील हैं। शील। कुछ गाढ़े हरे भी और बाकी पीले हैं कुछ अधपीले- कुछ छोटे हैं और कुछ दूर जा पड़े हैं अपने घर की सीमा से। फिर भी- मुझे पता है- मुझे ही क्या सबको पहचान है/ कि ये सब पत्ते नीम के ही हैं। नीम के इस पेड़ से आज-अभी कुछ पत्ते गिरे हैं।

मैं रहूँ सहज-और रहूँ बस

मैं मुझको जाणु और मैं ही पहचाणु मुझको। मैं बरसों-बरस खुल-खुल के बंधा जाता। मैं बिना पूछे-कहे निभाता जाता। यूँ ही चला चल राही कितनी हसीन है ये दुनिया। रास्ते- वास्ते बदले काहे को तू मन छोड़े काहे को अपनी बोली बदले तू अपनी भाषा ही अपनी है रहती परि-भाषा तो पराई ही है होती। मैं रहूँ सहज-और रहूँ बस .... बस रह जाऊँ-ख़ुद से निभा जाऊँ।

निचोड़ा हुआ सा मन और मन में गूँजती हुई आवाज़ें

दिनों दिन महीने और बरस-दर-बरस इक तारा बन के गूँजते बजते रहना और सम्मोहन को नाम देना प्यार का निभाते रहना और फिर एक दिन खींच लेना हाथ .... खाली हाथ-सामने वाली हथेली ही जब खामोश है अबके तो मेरी अंधी उँगलियाँ भला किसको थामें। तो भला कौन सा त्योहार-अबकी बार। ये कहानी है दोस्त किरदार बदलते हैं- कथानक तो वही रहता है। अजब होगा वो भी खेला जब हाथी से खाली हुई जगह को भरा जाएगा उसकी अनुपस्थिति से। इक तारा कैसा साज है... एकला भी कितना सहज है- भीड़ में भी कितना सरल। देखें ज़रा ज़िद्द करें हम भी। मंच के पीछे बहुत कुछ होता है कथानक में नहीं पात्रों के जीवन में- जीया जाये चलो उन्हीं पुराने दिनों को। इक तारा गूँजता रहे बस। सहज-सरल।

सारा दिन बैठा रहा शनि

मेट्रो स्टेशन के बाहर वहाँ जहाँ पास में खड़ी होती हैं कुछ रेहड़ियाँ - बहुत सारी रिक्शा जहाँ है एक पान-बीड़ी वाला और एक नीली वर्दी वाला भी, जिसका काम वैसे तो डाँटना-डपटना है रिक्शावालों को पर जैसे दो अलग-अलग दरख़्त दोस्त बन जाते हैं- वे भी सब दोस्त हैं अब। स्टेशन के बाहर वहीं गेट नंबर 2 की ओर जाते हुए फुटपाथ के सिरे पे रखा है एक काला लोहे का कनस्तर बिना ढक्कन का धुआँ-धुआँ है पास-आस उसके और खुले उस कनस्तर में कुछ पैसे पड़े हैं सटे-सटे से बहुत और कुछ अलग-थलग वो धूप-सुगंध घेराव कर रही है मनघड़न्त से साइज़-शेप के ढले उस धातु के टुकड़े का जो शायद लोहे का ही है। वहाँ वैसे कोई बैठा नहीं है-मैला सा कुर्ता और गमछा पहने! शनि बैठे हैं वहाँ और जो डरते हैं उनसे- अर्थात जो मिले नहीं हैं उनसे कभी वे- कुछ दान देते हैं कनस्तर को शनि सुबह से वहीं बैठा है लावारिस.... दोपहर को भी और जब मैं लोटता हूँ शाम को तब भी वही धूप-कनस्तर और शनि! कितनी आस्था रखते हैं लोग कनस्तर में- और शनि को कोई पूछता भी नहीं। जैसे-जैसे भरता है खुल्ले पैसों से खाली होता है शनि... हर हफ़्ते फिर आ जाता है कनस्तर अपने शनि के साथ!

हिंदी! तुम अब भी हो!

तुम बचपन से लेकर यौवन तक-साथ हो जो सीखा है तुम रही हो उसमें और जो सीखना है उसका भी माध्यम मूलत: तुम ही रहोगी! तुम शाश्वत उपस्थिति हो तुम सकारात्मक परिस्थिति हो तुम भरी पड़ी हो भावों से आयी हो कितने मुश्किल पड़ावों से किसी को जकड़ना हो अगर तो बस तुम्हें ही चोट पहुँचाना क़ाफी है सदियां गुज़री हैं तेरे साथ और तुम्हें मानकर! तेरा सम्मान करना सबके प्यार का सम्मान करना है और तुझे सीखना  सोचना सीख लेना है! तुम कविता कहळवती हो तुम कहानियाँ रचवाती हो तुम टूटमूईया-बेतरतीब लिखवा देती हो पर... तुम एक दिन मात्र बन के रह गयी हो तुम्हें मानने-अपनाने के लिए अब सरकारी आदेश आते हैं तुम तो सार्वभौमिक थीं ये क्या... तुम इतनी कमज़ोर कैसे हो गयीं  या के? तुम तो अब भी मज़बूत-सबल हो परंतु तुम्हें बोलने वाले अब निरीह-शिथिल हो चुके हैं हाइब्रिड जीवन जीने वालों ने तुम्हारा मोल-भाव किया है अपनी नयी सीखी भाषा से... हिन्दी... तुम आधुनिकों को अच्छी ना भी  लगो   तो... तो क्या हुआ... मैं  तो अब भी तुमसे ही सोचता-कहता हूँ और मेरे जैसे और भी है...बहुत सारे-सब हमारे! हिन्दी दिवस (14 सितंबर)