मैं तुम्हें याद आना चाहता हूँ, ताशकंद
मैं तुम्हें याद आना चाहता हूँ, वैसे नहीं जैसे चातक को बादल या के तितली को फूल मुझे तो याद आना है दरिया की तरह। तुम सागर हो जिसने मुझे अपनी गोद में रखा करने दी अठखेलियाँ और मेरी चंचल अपरिवक्ता को भी संयम से स्थान मिला। इतने विशाल हो तब भी इतने स्थितिप्रज्ञ और दृढ़ बहने-गिरने वाली नदी कहाँ सीख पाती है। सागर में कुछ तो है ऐसा, इसकी क्षितिज-विहीन सीमाओं के परे कितना लोहा-लंगड़-संताप-ठूँठ बह आता है और फिर भी माथे पर त्योड़ी नहीं पड़ती एक शहर- एक देश दोस्त और जानकर समंदर हैं अब सागर हैं जिसमें मैं बह कर गिरा गिरा बार-बार और रंगरेज सागर ने मुझे अपनी लहरों पर बैठाकर फिर से घाट उतार दिया हर बार एक नई सीप देकर- हर बार एक नया रंग देकर। ये बंधन शब्दों से तो परे का है कहा तो जा सकता है फिर भी… बस यही कहना था- प्रिय उज़्बेकिस्तान स्नेह- प्यार- मुहब्बत इसी का पर्याय बने रहना। नदी की नियति सागर में विलीन होना ही है- होती रहेगी।