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सड़क से सड़क

आलू गन्ने सरसों गेहूं ! सूरज की सुनहरी किरणों से चमकते-इठलाते... खेत देख रहा मैं सड़क से सड़क जाते। कितना कुछ है समझने-देखने को! जीवन को संसाधनों को ये प्रकृति कैसे अनुमति देती ...

सड़क खोखली है नीचे से

सुखी नदी के ऊपर भला ये कैसा पुल है, यूँ लगता है के सड़क खोखली है नीचे से... घर की पूजा से नाकारा हुए फूल-पत्ते-छिलके धूं-धूं कर जली राख-कुछ कागज़-कोई टूटी मूर्ति पुरानी तस्वीर-लाल चु...

सपने तो रहेंगे ना...

मैं चाहे मिट्टी का बना हूँ... तुम भी। सपने मिट्टी के नहीं... ना बने हैं पानी के.. हवा के... सपने तुम से बने हैं। जब तक मैं हूँ... सपने तो रहेंगे ना....!

राम

राम भला तुम हुए भी थे कभी और अगर हुए तुम तो किसके लिए थे बुराई पर अच्छाई की जीत या फिर मर्यादा के लिए। तुम थे मित्रता सिद्धान्त के लिए या के भगतवत्सल भाव या फिर तुम थे एक सभ्य-आदर्श पुत्र-पिता तुम भले भ्राता भी कहलाते हो और एक जीवनसाथी भी। अब वही उलझन है जग को जो जानकी को परखने में थी तुम्हें झगड़ा था कुछ-कुछ ज़िद्द-कुछ समझ-नासमझ। तब न्यायालय नहीं बैठे थे बस स्वतः ही पटाक्षेप हो गया था। तुम ही रह जाते तो कहीं भी रह लेते! अब तुम्हारे रहने को लेकर बहस है होने को लेकर असमंजस है। ना ही करते यात्रा जनमानस के मानस में तुम तो ठीक रहता। चारदीवारी में प्रतिबंधित होने के दंश से तो बच जाते। सोचता हूँ राम! अगर तुम नही आते (कल के बाद घर जायेंगे अपने राम। रावणों की दुनिया में हैं, कुछ बातें यहीं कह ली जाएं।)