हिंदी! तुम अब भी हो!
तुम बचपन से लेकर यौवन तक-साथ हो जो सीखा है तुम रही हो उसमें और जो सीखना है उसका भी माध्यम मूलत: तुम ही रहोगी! तुम शाश्वत उपस्थिति हो तुम सकारात्मक परिस्थिति हो तुम भरी पड़ी हो भावों से आयी हो कितने मुश्किल पड़ावों से किसी को जकड़ना हो अगर तो बस तुम्हें ही चोट पहुँचाना क़ाफी है सदियां गुज़री हैं तेरे साथ और तुम्हें मानकर! तेरा सम्मान करना सबके प्यार का सम्मान करना है और तुझे सीखना सोचना सीख लेना है! तुम कविता कहळवती हो तुम कहानियाँ रचवाती हो तुम टूटमूईया-बेतरतीब लिखवा देती हो पर... तुम एक दिन मात्र बन के रह गयी हो तुम्हें मानने-अपनाने के लिए अब सरकारी आदेश आते हैं तुम तो सार्वभौमिक थीं ये क्या... तुम इतनी कमज़ोर कैसे हो गयीं या के? तुम तो अब भी मज़बूत-सबल हो परंतु तुम्हें बोलने वाले अब निरीह-शिथिल हो चुके हैं हाइब्रिड जीवन जीने वालों ने तुम्हारा मोल-भाव किया है अपनी नयी सीखी भाषा से... हिन्दी... तुम आधुनिकों को अच्छी ना भी लगो तो... तो क्या हुआ... मैं तो अब भी तुमसे ही सोचता-कहता हूँ और मेरे जैसे और भी है...बहुत सारे-सब हमारे! हिन्दी दिवस (14 सितंबर)