Posts

Showing posts with the label Teachers' Day

गुरु मेरे! तुझसे हूँ मैं बड़भागी!

मेरे भाग्य में कहाँ लिखा था साहस विद्या सफ़लता और समर्पण! पग-पग पर पहरा रख कर पल-पल मुझे पाल कर अपने संग मुझे संभाल कर चाक बन घूमे हो आप। आज भी वही गति-गंतव्य है मुझ जैसे कितने कच्चे ढेर सवांर दिए अपने अस्तित्व से जोड़ कर। समय ने टकोर दी भी तो आप ये सुनिश्चित करते रहे... मुझ तक पहुँचे बस वही जो बढ़ाये-बनाये मुझे। आप गुरु जो बने रहे मेरे भाग्य की लकीरों में अर्थ तभी तो आया, आप गुरु जो बने रहे मेरे मन में साहस तभी तो आया, आप गुरु जो बने रहे मुझे संभलना-संभालना आया, आप जो रहे हैं जीवन में मैंने स्वयं को बड़भागी पाया, आप... गुरु बने गुरुवर तो ही तो मैं शिष्य कहलाया! मुझमें साहस-विद्या-समर्पण आपसे ही तो आया। .

सारी उम्र चाक बन घूमता है... मिट्टी को थामे रखता है...

बूंद भर उम्मीद समेट कर ले जाता है कतरा कतरा टटोलता है आशा और तराशने की तलब बढ़ाता जाता है दिन-दिन रात-रात जगता है सवालों के साथ सोया हुआ मिलता हैं कई बार घिरा हुआ जवाबों की जमहाई में दीवारों के बीच एक हरियाली पतंग बन उड़ता है थामता है कांपते मन माँगता है साथ ज़्यादा-सबसे बात करता हुआ सीखता जाता है। कई-कई बार तराज़ू में तुलता है-हल्का हो जाता है बाँटकर सब अपना ज्ञान! अपनी किताबें साँझी करता है- अपने घर-परिवार का कर लेता है विस्तार कभी मैदान की तरफ भाग लेता है खेलने को नन्हों के साथ और कभी रूमानी हो जाता है भीग बारिश में! हर दोहरा मानी संभाल लेता है- गर्मियों के खाली दिनों में बड़ी उदासी से चुप रहता है- सावन बन आते हैं वापस सुनने वाले तो बरस पड़ता है-खूब बोलता है छुट्टियों के बाद। अपने गुरुओं को याद रखता है- वैसा-सा ही बनना चाहता है। एक कुम्हार का संसार जैसे चाक पे होता है तैयार... सारी उम्र चाक बन घूमता है... मिट्टी को थामे रखता है... जब तक रूप नहीं लेती सही! एक पढ़ाने वाले का जीवन कितना काव्यात्मक होता है... कुछ भी कहो... अच्छा ही होता है! ‪#‎Teacher