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सड़क से सड़क

आलू गन्ने सरसों गेहूं ! सूरज की सुनहरी किरणों से चमकते-इठलाते... खेत देख रहा मैं सड़क से सड़क जाते। कितना कुछ है समझने-देखने को! जीवन को संसाधनों को ये प्रकृति कैसे अनुमति देती ...

संकोच कहाँ करता है

मनुष्य-कहने में कितना सजग सा शब्द है जीता है और जीतता है हारता है भी- भागता भी है। एक तरफ़ हो जाता है जब नहीं अच्छा लगता दूसरी तरफ़। और जब असमंजस हो इधर-उधर तो अपने आप को लेकर साथ स्थापना होती है आत्म-सम्मान की। जीवन चलाना है-चलना भी है। क्यूँ भला आसक्त हों-क्यूँ कभी परि-भक्त हों। अपनत्व अपने से ही हो तो कितना अच्छा लगता है। स्वयं को आये समझ जो वही स्थापित सत्य है।और जो है असत्य वह तो हवा में उगता है। क्यूँ हों आसक्त... किसी दुविधा नहीं- अपितु सुविधा का नाम है जीवन। तभी तो लगता है के दुपहिया है जीवन और त्रिकोण भी।

राम

राम भला तुम हुए भी थे कभी और अगर हुए तुम तो किसके लिए थे बुराई पर अच्छाई की जीत या फिर मर्यादा के लिए। तुम थे मित्रता सिद्धान्त के लिए या के भगतवत्सल भाव या फिर तुम थे एक सभ्य-आदर्श पुत्र-पिता तुम भले भ्राता भी कहलाते हो और एक जीवनसाथी भी। अब वही उलझन है जग को जो जानकी को परखने में थी तुम्हें झगड़ा था कुछ-कुछ ज़िद्द-कुछ समझ-नासमझ। तब न्यायालय नहीं बैठे थे बस स्वतः ही पटाक्षेप हो गया था। तुम ही रह जाते तो कहीं भी रह लेते! अब तुम्हारे रहने को लेकर बहस है होने को लेकर असमंजस है। ना ही करते यात्रा जनमानस के मानस में तुम तो ठीक रहता। चारदीवारी में प्रतिबंधित होने के दंश से तो बच जाते। सोचता हूँ राम! अगर तुम नही आते (कल के बाद घर जायेंगे अपने राम। रावणों की दुनिया में हैं, कुछ बातें यहीं कह ली जाएं।)

पूरा चाँद कितने उफान लाता है

पूरा चाँद कितने उफान लाता है भावों के अभावों के आने और जाने के सुनने-सुनाने के भूलने के-भुलाने के रूठने के-मनाने के रुकने-लौट के आने के। पूरे चाँद को इतना कुछ पता कैसे होता ह...