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किसी को दिखता नहीं, इसका मतलब ये तो नहीं कि मैं हूँ ही नहीं!

मैं बहुत महीन हो गया हूँ ज़रा सी हवा, ज़ोर-झटक डिगा देती है मुझे अपने स्थान से सरूप नहीं है पता पर चोकोर और वृत के बीच वाला कुछ आकार है शायद। महीन मैं साहिब की ओर बढ़ने को तत्पर उमंग-उल्लास-अचरज-अचम्भा कुछ भी नहीं चेहरे पर, परन्तु विश्वास, विनम्रता, विनय, विनती  मांगने चला, मुर्शिदों की तलाश में मैं। लचक खिलोने की तरह जितना नीचे लुढ़का उतना की ऊपर उछल आता, हिम्मत करके, ये तो रमज़ भी किसी अजूबे निराकार की लगती मुझे। वो धो देगा मटमैला आवरण और करेगा शामिल अपने में, अपनों में, और फिर से छोड़ देगा इसी धरती पर , किसी दरिया में लुढ़कने को तलहटी से लगकर, लहरों में सिमटकर बहने के लिए। जब तलक नहीं मिले ऐसा कोई तो बस उड़ता रहूँ यूँ ही हवाओं में  अपनी ज़मीन देखते हुए- तलाशते हुए! किसी को दिखता नहीं, इसका मतलब ये तो नहीं कि मैं हूँ ही नहीं!

Taar nukiley hotey hain

 T aar nukiley hotey hain ghar k baahar diwaar k upar kinaare-kinaare kitne din bandhey rahtey hain na kuchh kahte na bolaa kartey hain Rukney waale ruktey khud hi ye na kisi ko roka karte hain aur to sab theek hi hai inka bas taar nukiley hotey hain

वो लौट आएं अगर

  वो लौट आएं अगर तो समय और सामयिक सिद्धान्त जीवन और समझ के, सब बदल जाएंगे यकायक। वो लौट आएं अगर तो मुझे सही संबल मिलेगा सबल होने का जो उनके साथ होकर मिलता था मिलता है अब याद करके-बात कर कर। कल की रात बादलों में अठखेलियाँ करता दो कला छोटा चाँद देखा था कभी बादल उसके ऊपर लुढ़कते तो कभी वो खिसक आता घटाओं में से जैसे मेरा बेटा कहता कि वो खेलता है पार्क में लगी फिसल पट्टी पर। ये चाँद होगा पूरा और मैं कर रहा हूँगा याद अपने गुरुओं के आशीष को और उनको भी जिन्होंने मुझे बोने दिए मेरे सपने उनके सच्चे मन की धरा पर। तपाक से बोल आता हूँ मैं पूरे दशक की कहानी कैसे किया इतना कुछ स्थापित एक नवाचार जैसा। मेरे सिखाने-मुझसे सीखने वाले एकदम जादूगर हैं! कुछ भी करवा लेते हैं। यकायक याद भी आ जाते हैं! वो लौट आएं अगर तो कितना अच्छा हो!

मुझे मेरी कविताएं कहनी हैं

मुझे मेरी कविताएं कहनी हैं और तुम्हें कहना है वो जो दोहराव से परे आभास के इस ओर की बात है। मुझे कहना है कि जब भी तुम कहते हो शब्द् सटीक-सुन्दर मैं उकेर देता हूँ पंछियों का कलरव बारिश की रिम-झिम खिलखिलाहट छुटपन की और रूमानी मुहब्बत की बातें... नाम तो मेरा होता है... सोचा है मैंने कि क्यों न ऐसा करें हम दोनों एक-नाम भी हो जाएं। एक तो हैं ही...!

साथी यूँ ही बढ़ते रहना...

  साथी! तुझपे सातवाँ पत्ता आया है सात जो बिल्कुल साथ-सा बुल जाता है... उच्चारण में... सप्त जो दिनों को स्वरों को रिश्तों के वचनों को... रंगों को... पड़ावों को गिनता है... क्रमबद्ध करता है... वही सात अगर मुझे भी मनबद्ध जीवनबद्ध साहसबद्ध नियमबद्ध कर दे तो कितना सरल हो जाये जीवन! साथी यूँ ही बढ़ते रहना... किसी भी रूप में किसी भी नाम से। बस हरे रहना! साथी... सातवाँ पत्ता मुबारक!

सुन मेरे हिन्दोस्तान

 सुन मेरे हिन्दोस्तान  तुम अगर इंसान होते ना  ज़ोर का गले लगाता  रो भी पड़ता और चुप भी रहता! कहता तुझसे कि इतना भी आसान नहीं हैं  अपनी ही मिटटी से दूर रहना और  भारतीय ही कहना खुद को! अपने तिरंगे को निहारना विदेशी आसमान में  और  कभी-कभी ये भी होना की उदास रहना  और कभी इतनी ख़ुशी कि सब भूल जाएँ! कभी अपने खाने को खोजना  जैसे जंगल में हिरन कोई कस्तूरी की खोज के हो  हिंदुस्तान मेरे, तुम अगर इंसान होते ना  लौटते ही तुम्हारी धरती पर,  तुम्हारे पैर छूता और कहता -  तुम कितने विशाल को, कितने ख़ालिस, कितने सच्चे  जैसे हो समावेशी तो हो ही,  मुझे समा के रखते हो खुद में और  शरीर भेज देते हो सीमाओं के पार -  देश तो अपना है न, अपने से है

सड़क से सड़क

आलू गन्ने सरसों गेहूं ! सूरज की सुनहरी किरणों से चमकते-इठलाते... खेत देख रहा मैं सड़क से सड़क जाते। कितना कुछ है समझने-देखने को! जीवन को संसाधनों को ये प्रकृति कैसे अनुमति देती ...

सड़क खोखली है नीचे से

सुखी नदी के ऊपर भला ये कैसा पुल है, यूँ लगता है के सड़क खोखली है नीचे से... घर की पूजा से नाकारा हुए फूल-पत्ते-छिलके धूं-धूं कर जली राख-कुछ कागज़-कोई टूटी मूर्ति पुरानी तस्वीर-लाल चु...

सपने तो रहेंगे ना...

मैं चाहे मिट्टी का बना हूँ... तुम भी। सपने मिट्टी के नहीं... ना बने हैं पानी के.. हवा के... सपने तुम से बने हैं। जब तक मैं हूँ... सपने तो रहेंगे ना....!

कुकुरमुतों के काफ़िले

सभी सभासदों के बीच ये बात है आज फिर कीडे-मकोड़े आने हैं। कभी हरियाली हुई काली और अब गुलाबी को बेरंग करते कुकुरमुतों के काफ़िले बढ़ रहे हैं। उन्हें बताया गया है के वे बढ़ रहे हैं ...

बस आ जाना

कैसा उलटफेर है जीवन का द्रोण बना रहे हैं मिट्टी से एकलव्य आँखों के पानी से भिगो रहे मिट्टी बरसते कभी-कभी थामते कभी तहों से अपनी थोड़ी मिट्टी उतारते उकेरते एकलव्य की शक्ल-भाव बरबस ही ज़्यादा भी उड़ेल देते हैं पानी और मिट्टी छप-छप हो जाती है। फिर कुछ देर थामते घटाओं को और चाक घुमाते जीवन का। द्रोण! टूटे-फूटे, रूखे-सूखे पड़े हैं यहीं, मेरे पड़ोस में, घर में, बगल में मुझ में! अब शांत रहते हैं उनके हाथ पानी भी और गहरे उतर गया है। एकलव्य की मिट्टी रम-सम सी गयी है उनके ही इर्द-गिर्द। अपने दोषों का रोपण कर बैठे हैं द्रोण अपने ही जीवन में। कड़ी फ़सल काटनी पड़ रही है बिलख कर रोते हैं रटते हैं दोहराते हैं कराहते हैं द्रोण। कहते हैं मुझे मुझे ले चलो कहीं उस छोर-उस ग्रह जहां आँखों में धुआँ हथेलियों में नमी ... ... पता नहीं द्रोण को क्या चाहिये बस पिछले पहर से ही बिलख रहे हैं। आओ तो एक रुमाल ले आना। कुछ और नहीं। बस आ जाना। याद जो आती है बड़े-बड़े ठूंठ हिला देती है।

संकोच कहाँ करता है

मनुष्य-कहने में कितना सजग सा शब्द है जीता है और जीतता है हारता है भी- भागता भी है। एक तरफ़ हो जाता है जब नहीं अच्छा लगता दूसरी तरफ़। और जब असमंजस हो इधर-उधर तो अपने आप को लेकर साथ स्थापना होती है आत्म-सम्मान की। जीवन चलाना है-चलना भी है। क्यूँ भला आसक्त हों-क्यूँ कभी परि-भक्त हों। अपनत्व अपने से ही हो तो कितना अच्छा लगता है। स्वयं को आये समझ जो वही स्थापित सत्य है।और जो है असत्य वह तो हवा में उगता है। क्यूँ हों आसक्त... किसी दुविधा नहीं- अपितु सुविधा का नाम है जीवन। तभी तो लगता है के दुपहिया है जीवन और त्रिकोण भी।

अभी तो राम रास्ते में हैं!

अभी तो राम रास्ते में हैं! आयें तो कहना... मैं आया था पूछने-बताने तो नहीं कहने-चेताने तो नहीं नहीं रोकने को- ना टोकने को... मैं आया था बांटने को बातें नाते-रिश्ते-सौगातें... मुझे बत...

राम

राम भला तुम हुए भी थे कभी और अगर हुए तुम तो किसके लिए थे बुराई पर अच्छाई की जीत या फिर मर्यादा के लिए। तुम थे मित्रता सिद्धान्त के लिए या के भगतवत्सल भाव या फिर तुम थे एक सभ्य-आदर्श पुत्र-पिता तुम भले भ्राता भी कहलाते हो और एक जीवनसाथी भी। अब वही उलझन है जग को जो जानकी को परखने में थी तुम्हें झगड़ा था कुछ-कुछ ज़िद्द-कुछ समझ-नासमझ। तब न्यायालय नहीं बैठे थे बस स्वतः ही पटाक्षेप हो गया था। तुम ही रह जाते तो कहीं भी रह लेते! अब तुम्हारे रहने को लेकर बहस है होने को लेकर असमंजस है। ना ही करते यात्रा जनमानस के मानस में तुम तो ठीक रहता। चारदीवारी में प्रतिबंधित होने के दंश से तो बच जाते। सोचता हूँ राम! अगर तुम नही आते (कल के बाद घर जायेंगे अपने राम। रावणों की दुनिया में हैं, कुछ बातें यहीं कह ली जाएं।)

आजकल

सचमुच आसान नहीं होता बंद दरवाज़ों से आती एक महीन सी रोशनी की लकीर के सहारे रास्ता सोचना। और मान लेना कि यहीं से कहीं जाता है इक और रास्ता जो इस दरवाज़े के उस ओर किसी नई दुनिया में खुलता है। शब्द् तो जो कहे जा चुके-कहे ही जा चुके हैं। पर इतना भी क्या भरोसा कहे शब्दों पर कि इंसान अपना कहा नकार न सके। दूसरे का कहा सुधार न सके। अनकही समझ न सके। कही को सही से मान ले। छोटे-बड़े होने से कुछ नहीं होता मगर छोटा-बड़ा बोलने से तो बहुत कुछ होता है भाई। कितनी बातें, बायें - दायें हो जाती हैं। मेले में-रेले में कितनी बातें इधर से उधर हो जाती हैं। पर जब ये बिछड़ी-उलझी बातें बुरा नहीं मानती- तो हम क्यों बुरा मान जाते हैं। छोटे को बड़ा कहलवाने से कुछ नहीं होता बड़े को बड़ा मानने से बड़प्पन आता है। ख़ुशी आती है। रिश्ते चल निकलते हैं। अच्छे से। #रामायणtales #दुनियादारी #आजकल

मितर प्यारे नूँ, हाल मुरिदाँ दा कहणा

इतना भी आसान नहीं नींद सो जाना चैन की। जो जानते हैं सुकून का रास्ता चलते रहते उसपर और जो नहीं जानते भटकते रहते ता-उम्र! जो दिख रहा हर ओर कि इंसान एक-दूसरे को ही काट रहा-छोड़ रहा औ...

किसे नहीं भाएगा भला...

किसे नहीं भाएगा भला... अपनी महीन रेशमी मुठ्ठी में जब जकड़ ले मेरी एक अंगुली को... और टिम-टिम करती आँखों से निहारे वो अपने पैरों को हवा में उड़ा मस्त दिखे और बुलबुले उड़ाये होठों से... बिल्कुल वैसे जैसे आपको भाते हैं। जब कुरेदे अपने रेशम से भी नरम नाखूनों से मेरे चेहरे को गोदी में आ चुप हो जाए रोने से और अहसास दे आपको सबसे बड़ी जीत का। निन्नु ले दैवीय सी अपने जीवन की पहली आपके सीने से सटकर... आप अपनी बाहँ डाले रखो के कहीं लुड़के ना इधर-उधर। जब बैठे-बैठे थकन की नींद भरपूर आनंद दे... सोये आपका बेटा आपकी गोदी में और नसीहत मिले के बिगाड़ो मत। और आप कहो के इत्ते से क्या होता है... और लगो इतराने-बतियाने-बोलने-समझने। इस से बड़ा क्या भला पागलपन के जब पता हो के इसे नहीं पता भाषा का और फिर भी सब कहे जाता हूँ-इसी यकीन से कि मेरा ही तो अंश है-इसी को तो सब पता है मेरा। कितना भला लगता है नोजी से नोजी भिड़ाना... और नटखटी बातें बनाना... और मासूम छुअन जादू कर दे मन पर तो बलैयाँ ले लेना चाँद की अपने। कभी ठुड्डी ढूंडो तो कभी नाक मिलाओ कभी ऒऒऒऒ कभी उ उ उ उ उ एक नयी वर्णमाला जिसका कोई सिमित व्याकरण नहीं।...

माँ किसान की बेटी है!

माँ तुम ठीक ही करती थीं हम रहते थे छोटे से एक कस्बे में और गर्मी की छुट्टियों में नाना के घर जाते थे। गेहूँ कटती थी उस मौसम में जब स्कूल की होती थी छुट्टी और ख़ूब काम करते थे हम खेतों में। मैं सो जाता था निढाल थककर सुनहरे मोतियों के ढेर पर मखमल से भी मीठी नींद आती थी। वो अनाज जो गेहूँ की बालियों से चुन लेते थे सब मामा मेरे कल भी-आज भी देखा जाते हुए-आते हुए दफ़्तर, वो तिजोरियाँ भीग रहीं हैं पानी बरस रहा है लबालब अनाज पर और तेज़ बारिश सावन नहीं लग रही मौसम सुहावना-रूमानी कुछ भी नहीं लग रहा ये बुरा-सा और याद आ रहा वो वहम माँ का हम रहते थे छोटे से एक कस्बे में, माँ दौड़ कर रख देती औंधे मुहँ काला तवा, बरसना रुक जाएगा-गेहूँ नहीं बहेगी-किसान बच जाएगा-अनाज बन जायेगा! माँ का ये सत्याग्रह कितना ज़रूरी है, माँ किसान की बेटी है!

पूरा चाँद कितने उफान लाता है

पूरा चाँद कितने उफान लाता है भावों के अभावों के आने और जाने के सुनने-सुनाने के भूलने के-भुलाने के रूठने के-मनाने के रुकने-लौट के आने के। पूरे चाँद को इतना कुछ पता कैसे होता ह...

गुरु मेरे! तुझसे हूँ मैं बड़भागी!

मेरे भाग्य में कहाँ लिखा था साहस विद्या सफ़लता और समर्पण! पग-पग पर पहरा रख कर पल-पल मुझे पाल कर अपने संग मुझे संभाल कर चाक बन घूमे हो आप। आज भी वही गति-गंतव्य है मुझ जैसे कितने कच्चे ढेर सवांर दिए अपने अस्तित्व से जोड़ कर। समय ने टकोर दी भी तो आप ये सुनिश्चित करते रहे... मुझ तक पहुँचे बस वही जो बढ़ाये-बनाये मुझे। आप गुरु जो बने रहे मेरे भाग्य की लकीरों में अर्थ तभी तो आया, आप गुरु जो बने रहे मेरे मन में साहस तभी तो आया, आप गुरु जो बने रहे मुझे संभलना-संभालना आया, आप जो रहे हैं जीवन में मैंने स्वयं को बड़भागी पाया, आप... गुरु बने गुरुवर तो ही तो मैं शिष्य कहलाया! मुझमें साहस-विद्या-समर्पण आपसे ही तो आया। .