वो पन्ने जो किए थे ओस के हवाले ॥



वो पन्ने जो किए थे
ओस के हवाले
आज उठा लाया हूँ
थोड़ा धूप मे रख कर सुखाना है बस...
कभी कभी मेरा ये सीलन भरा मन
सोच बैठता है कि
कैसा हो अगर
सूरज की भी कलाएं हो जाएँ
चाँद की तरह ।
ओस की बुँदे टक-टकी लगाए
मेरे ये ख्याल देखे जा रहीं हैं....
कहने का हक़ है मगर
कहती नहीं हैं कुछ
बिलकुल तुम्हारी तरह....!
ओस की बुँदे
टप-टप गिरती हैं
मेरे भीतर
भर देती हैं मुझे
एक सागर की तरह
और छोड़ देती हैं पूरे चाँद के लिए...वो आए
और ज्वार लाये जितना चाहे।
बह उठता है पानी
वो जो इकठ्ठा हुआ था
कभी
ओस की बुँदे बेच कर...
आज वही हिसाब देखना है...
क्या खोया है
क्या पाया है....
इसीलिए....
वो पन्ने जो किए थे
ओस के हवाले
आज उठा लाया हूँ
थोड़ा धूप मे रख कर सुखाना है बस...

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