रतजगा है एक... जिसमें मैं सोता हूँ...


मुझसे कहा तो होता किसी ने
कि तुम याद करते हो
नाराज़ हो
मना लेता मैं...
छोड़ देता ख़ुद को
तुमने कहा नहीं
कहलवाया भी नहीं
अरसे बाद बहे हो तुम
तुम्हारी ही आँखों से।
मैंने ना कहा था
एक हद तक ही मना सकता हूँ ख़ुद को...
उसके बाद तुम्हारा आना ज़रूरी है
तुम्हारा होना मेरे लिए सहारा नहीं है
पहचान है मेरी...तुम्हें खोना
हार नहीं है मेरी,,,
रतजगा है एक... जिसमें मैं सोता हूँ...
फिर से बोने की कोशिश में
कुछ सांझे सपनों को....
आओ अगर तो सहला जाना ज़रा...
तुम्हें भी तो प्यारे थे...
मुझसे कहा तो होता॥

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