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कह दे के, बोल दे अब तो

कह दे के, बोल दे अब तो- अब तो वक़्त तुम्हारा है। बरसों-बरसों की ख़ामोशी बीती- अब तो पास किनारा है। जिंदा होना-जिंदा दिखना; कहना-सुनना चलते रहना और भला क्या सोच रहे हो- इतना ही काम हमारा है। बुझे पड़े हैं चेहरे देखो-कहो ज़रा हुक्मरानों से अब तो, कौन-सी तुम आब हो पीते- हमारे घर का पानी खारा है। कुछ मुहब्बत की बात करें भला कैसे- क्यूँकर हम ....... ....

ये साल जिसमें तुम मिले...

आओ हाथ थाम कर देखते हुए सपन सांझे आगे चलते हैं। उस तरफ जिस तरफ़ से आती हैं खुशबुएँ मीठी और सब अपनी बातें सुनाई देती हैं जहां वहीँ जहां तुम रहते रहे- वहीँ जहां मैं मिल गया तुमसे वहीँ जहां सब रंग मिलकर एक रंग के हो जाते हैं। वहीँ जहां अनहद का विस्तार है कथा और भाव हैं। बीते साल ने इस साल को और इस कैलेंडर ने एक और नए कैलेंडर को दे दी है आवाज़। और देखना तुम... जैसे इस बारहखड़ी में तुम और मैं एक शब्द बने आने वाले दिनों में यही साथ बढ़ेगा। ये साल जिसमें तुम मिले पहचान मिली इस साल की बरकत बनी रहे कल और उसके साथ आने वाले हर कल में।

छोटी-छोटी अँखिओं में...

छोटी-छोटी अँखिओं में बड़े-बड़े सपने कैसे पल-पल पल जाते हैं ये अपने... नयी-नयी सी आहट आती और कहती वही पुरानी बातें अपनी सबकी और कहती हैं अपनी ज़ुबानी। कोई विराम नहीं है देखो और नहीं कोई श्योक्ति भी हाँ पर यादों में अनुस्वार है अनंत-अद्भूत पुनरुक्ति भी तो है। कैसा-किसने घड़ा है ये व्याकरण किसने बनाई है ये क्यारी कौन खेल रहा गुनगुनी छुप्पा-छुप्पी कुछ भी छुपा नहीं-गुम नहीं है यहाँ... छोटी-छोटी अँखिओं में बड़ी-बड़ी यादें... छोटी-छोटी यादों में देखो धुंधली-सी परछाई-सी है... चेहरा भी तुम्हारा मुस्कराहट भी और देखो नाम हम दोनों का... छोटी-छोटी अँखिओं में।

आभास...

आभास कितना सहज है होता जब आता है पिरोये हुए अहसास को अपने में। आओ सहजता का आभास पिरोयें अपने में।

कथा की कहानी

मैं कथा की कहानी कहने चला हूँ। कथा को हम सभी जानते हैं। हम सब में एक कथा है- मुझमें और आप में - हर उस मन में कथा का ठहराव है जिसे आस पास का कुछ महसूस होता है। कथा प्रतीक है- पर आप इसे एपिसोड्स में नहीं बाँध सकते। अभी तो आईडिया ही आया है- जब कुछ कहने लायक होगा तो छप जाएगा फेसबुक पर भी। अभी मन के काग़ज़ों पे ही छींटें पड़ रहे हैं। आओ कहानी कहें। विशेष नोट ( इंग्लिश में भी लिख सकता था मैं पर मित्रवर नकार गए सो मन की बात मन की भाषा में लिखी जाएगी)

अराजकता के महासम्मेलन

सभी सभासदों के बीच ये बात है आज फिर कीडे-मकोड़े आने हैं। कभी हरियाली हुई काली और अब गुलाबी को बेरंग करते कुकुरमुतों के काफ़िले बढ़ रहे हैं। उन्हें बताया गया है के वे बढ़ रहे हैं जब सभासद जीत रहें हैं। फिर भी नागरिक का सामूहिक शोषण है। उदासीनता है- हताशा है प्रजातंत्र में। भंग करने की लालसा है जनता में। कि अब नहीं उम्मीद कोई बस गिरावट ही गिरावट है। और देखो भला... असमंजस में फ़सीं भेड़ें गाड़ियों में ठूस ली गयी हैं। वही गाड़ियां पहले हरी पगड़ियों से सनी और अब गुलामी का गुलाबी पहन के सर पे बढ़ी जा रही हैं। आज तो ख़ाकी भी डंडा लिए जनता की सेवा में है। मजाल है कोई जाम लगे। आज-कल तो अराजकता के महासम्मेलन होते हैं। आओ शाम की वापसी की हुल्लड़बाज़ी का इंतज़ार करें।

हम निभा लें धरती ही...

जहां चाँदनी मुस्कुराती हो समय से आती हो-साथ रहती हो। ठंडक स्वभाव में होनी ही चाहिये। और क्या जवाब दें भला... ग्रहों-ग्रहों भटकने वाले हम निभा लें धरती ही तो बहुत होगा। मौकापरस्ती की कौम है बनी सारी थोड़ा इसी गिरावट को सम्भालें तो बहुत होगा।