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लो मैं लगा हूँ उकेरने आज प्यार तुम्हारा...

लो मैं लगा हूँ उकेरने आज प्यार तुम्हारा... और देखो सब निहार रहें हैं मुझे! मेरी मुस्कुराहट सबको अपनी-सी लग रही है मेरी हथेली में ढूंढ रहें हैं सब अपना-अपना सौभाग्य! वही हथेली-जिसपे चाँद बनाया था तुमने... मेहंदी रंग का! और मुझे वो धुधिया लगा था! कितनी ठंडक है स्पर्श में तुम्हारे! किसी को भिगो रहे हो-किसी को संभाल किसी को समेट रहे हो-किसी को खंगाल... तुम , कितने आप हो ! सभी रंग अपने को समर्पित कर चुके हैं संगीत-सा आ गया है चेहरे पे मेरे मेरा चेहरा तुम्हारा चेहरा है ना ! पलकें हैं ना तुम्हारी पंखुरियाँ हैं ना जो गुलाब की... और वो प्यारी-सी नखरो ठुड्डी... .... मैंने तो सब अपना मान लिया है मन से... बहूत प्यारे हो... सुंदर भी!

आसक्त नहीं- सशक्त होना ज़रूरी है...

बात करते-करते कितनी बातें बन जाती  हैं बन जाती हैं कितनी बातें- खेल खिलौने कितने आ जाते हैं आ जाते हैं खेल-खिलौने! आना जाना   लगा रहता है- जो जाता है वही आता है या कहूँ जो आता है- वो जाता है... संभालना-समझना-संजोना सब तो इस आने-जाने की बीच का रास्ता है और रास्ता साधन मात्र नहीं... अपने आकार को देखना-चलना ज़रूरी है आसक्त नहीं- सशक्त होना ज़रूरी है..

तुम ही बता दो

तुम पर बात कहूँ तो रंग बिखर जाते हैं हर तरफ़ अब तुम ही बता दो, मैं रंगो से बात करूँ या ख़ुद से...

तुमसे ज़्यादा कौन रूमानी है-कौन प्यारा है- कौन अपना है!

“ कुछ रूमानी लिखो ना! मौसम भी अच्छा सा है... या कहूँ के तुम सा है। ” ये बात कही है उसने मुझे और मैं लिखने बैठा हूँ... कुछ रूमानी कुछ प्यारा कुछ रंगीन कुछ ऐसा जिसमें बात भी हो और साथ भी... जो पास भी हो और ख़ास भी। जिसमें जादू भी हो और हो जादूगर भी... जिसमें बचपन हो और उम्र भी॥ भला लिखना कैसे आ जाता है जब तुम्हारा हुकुम होता है...या कहूँ के तुम ऐसे ही कह देते हो कि सुनाओ ना कुछ अपना सा- और मैं लिखने बैठ जाता हूँ! कुछ रूमानी कुछ प्यारा सा कुछ अपना सा रंगीन …………….. अरे सुनो ………. मुझे सुनने वाले मेरे साथी तुम्हारा नाम तो कहो ज़रा वही लिख कर कागज़ भेज दूँ तुम्हारे पास... भला- तुमसे ज़्यादा कौन रूमानी है-कौन प्यारा है- कौन अपना है!

छुपन-छुपाई.....

छुपन-छुपाई खेला करते बचपन में... सोचा करते खेल है ये-खेल खेल में ढूंढा करते छिपे हुओं को गिनते थे गिनती और दौड़ते जाते थे बोल-बोल कर दोस्त अपने को ना पहले कहते थे कुछ हाँ... कभी-कभी उनको ही कहते थे पहले …….. कितना खिलाड़ी है ना ये ऊपर वाला खेल भी खेलता है और धप्पा भी नहीं करता। बस खोजने देता है ख़ुद ही- ख़ुद को!

कितना अच्छा हो.....

कुछ शरारत सूझी है....कुछ बहुत दिनों बाद... कुछ कुछ तुम भी पढ़ लो... कोने का कैबिन जागा है... कुछ टुकड़े टूटे तुम्हारे बालों के मेरे घर मिल जाएँ तो... मेरे घर के शीशे पे तू अपनी इक सुर्ख़-सी बिंदी चिपकाए तो पहरों जाग-जाग के मुझको ... सारी-सबकी बात बताए तो अटक-अटक, भटक-भटक के, कुछ किस्से भूल भी जाये तो... एक अचानक- बीच बात में मुझे तू कुछ भी याद दिलाये तो... देख मुझे सटी चौखट से तू मद्धम-मद्धम मुसकाए तो घर का चौका तेरा हो और हम मिलकर कुछ बनायें तो... मैं तुम्हारा आधार बनूँ और तू मुझपे इठलाये तो... रंग-बिरंगी सब रंगों की हर रंगोली सजाएँ तो मैं जब लिखूँ मन की बातें तू ही मुझे सराहे तो... गीत चुनें हम सांझे-सुंदर और मिलकर उन्हें गायें तो बचपन में लौटें साथी बनकर तू ख़ूब मुझे हसाए तो .............. तो भला-और-भला....क्या हो... तू मुझे बताये तो... कितना अच्छा हो तू मुझे मिल जाये तो!!!

अब कोई छोटा नहीं रहा ना...

तुम बड़ी-बड़ी बातें किया करते मैं छोटी-छोटी बातें करता था... बातों में भला ये भेद- कैसा ? टकराता था बड़प्पन कभी मुझसे तो और छोटा हो जाता था और इसी उम्मीद में कि एक दिन हम बराबर हो जाएँगे- सब अपना लिया जाता था! किसी एक क्षण में तुम भी क्षीण होते थे और मैं भी... और कोई भी नहीं होता था! तभी शायद बोध होता हमारे अपनेपन को बड़प्पन का और हम ठहाके लगाते थे , उन्हीं लड़कपन की बातों पर। परिपक्व होना अपने भूत की ओर दोनों आँखों से देखना ही होता है शायद , बिना किसी डर के! आज फिर , हम उसी बहस में उलझें हैं कोई तरतीब नहीं- बस बड़ी बड़ी बातें अब दोनों करते हैं अब कोई छोटा नहीं रहा ना॥