आसक्त नहीं- सशक्त होना ज़रूरी है...


बात करते-करते
कितनी बातें बन जाती  हैं
बन जाती हैं
कितनी बातें-
खेल खिलौने कितने आ जाते हैं
आ जाते हैं खेल-खिलौने!
आना जाना लगा रहता है-
जो जाता है वही आता है
या कहूँ
जो आता है- वो जाता है...
संभालना-समझना-संजोना
सब तो इस
आने-जाने की बीच का रास्ता है
और रास्ता
साधन मात्र नहीं...
अपने आकार को देखना-चलना ज़रूरी है
आसक्त नहीं- सशक्त होना ज़रूरी है..

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