ये वापसी का सफ़र


ये वापसी का सफ़र बेशक
मांगा था कभी...
पर—आज ना दे मुझे!
मैं वापस लेता हूँ वो दुआ अपनी ....!
अब कितनी यादें हैं मुझे रोकने को।
क्या पता कैसी ये हालत है
मन की आज???
देखा था मैंने बहुतों को जाते हुए इस
गुलिस्ताँ से...
मगर.....
आज मुझे जाना है....!!!!!!
कैसे रितकर जाते थे वो साथी मेरे...
कैसे करते थे कोशिश... जल्दी-जल्दी
सामान समेटने की...
हर वो सजाई हुई बात.... वो चीज़ें...
कैसे उठाऊँ भला....
!!!!
देखो !!!!
मुझसे नहीं उतर रहा ये कागज़ दीवार से.....
देखो, वहाँ ऊपर हाथ नहीं पहुँच रहा मेरा....
हाथ बटाओ मेरा॥
मेरे दोस्त॥ साथी॥
कितना मुश्किल है तुमसे अलग होना...
मैं खाली होता हूँ सफ़र में आज....
......
सोचता हूँ.....
जब पहुंचुंगा घर की दहलीज़ पर तो
खाली हो चुका होऊँगा तब तक!!!

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