मेरी आँखों की कलाएँ ना देख पाये तुम...

चाँद की कई कलाएँ होती हैं...
एक ज़बान होती है आँखों की !
मैने जब सोचा कि
दिल की बात उडेल कर
ये गठरी उतार दूं...
कुछ ही शब्द
थोड़े से शब्द
अपने शब्द मैनें ढूँढ ही लिए!
मगर मेरे लफ़्ज़ों का साथ नहीं दिया
होठों ने.
रास्ता देने वाला ही जब
दरवाज़ा बंद कर ले,
जब चाँद और आँखों को अलग कर दिया जाए...
कुछ तो फ़र्क पड़ता होगा ! ?
....
....
चाँद की ज़ुबान तो तूने समझी दोस्त
मेरी आँखों की कलाएँ ना देख पाये तुम
..........मैं तबसे
खाली ज़मीन पर अकेला हूँ.....

28 जून 2007



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